राजाजी की टेरिटरी क्यों छोड़ रहे वन्यजीव? उत्तराखंड से हिमाचल पहुंचा टाइगर, लगाए गए ट्रैप कैमरे

उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व का एक बाघ पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब के जंगलों में दिखाई दिया

देहरादून: राजाजी टाइगर रिजर्व में एक तरफ वन विभाग बाघों की संख्या बढ़ाने में जुटा है, तो दूसरी तरफ यहां से तमाम वन्यजीव बाहर निकल रहे हैं. खास बात यह है कि टाइगर रिजर्व की टेरिटरी छोड़ने के बाद ये वन्यजीव वापस भी नहीं लौट रहे हैं. इसके चलते राजाजी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों को ही इन वन्यजीवों को ढूंढने के लिए टेरिटरी से बाहर जाना पड़ रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिरकार राजाजी की टेरिटरी को ये वन्यजीव क्यों छोड़ रहे हैं. ईटीवी भारत की स्पेशल रिपोर्ट.

राजाजी की टेरिटरी छोड़ रहे वन्यजीव: राजाजी टाइगर रिजर्व से वन्यजीवों के लगातार बाहर निकलने और पड़ोसी राज्यों तक पहुंचने की घटनाओं ने वन विभाग के सामने नए सवाल खड़े कर दिए हैं. एक ओर जहां उत्तराखंड का वन विभाग राजाजी में बाघों और अन्य वन्यजीवों के संरक्षण तथा उनकी संख्या बढ़ाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कई वन्यजीव अपनी पारंपरिक टेरिटरी छोड़कर दूसरे क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई वन्यजीव वापस राजाजी नहीं लौट रहे हैं. यही वजह है कि अब राजाजी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों को अपने जंगलों से बाहर निकलकर पड़ोसी राज्यों तक जाकर इन वन्यजीवों की तलाश और निगरानी करनी पड़ रही है.

हिमाचल पहुंचे उत्तराखंड के अफसर: हाल के दिनों में राजाजी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों और वन्यजीव विशेषज्ञों की टीम हिमाचल प्रदेश के जंगलों में सक्रिय दिखाई दी. पहली नजर में यह किसी अंतरराज्यीय वन्यजीव संरक्षण अभियान का हिस्सा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की वजह कुछ और ही थी. दरअसल हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब क्षेत्र में एक बाघ देखे जाने की सूचना सामने आई थी. वन विभाग को शक है कि यह बाघ राजाजी टाइगर रिजर्व से निकलकर हिमाचल प्रदेश तक पहुंचा है.

राजाजी का बाघ हिमाचल पहुंचा: इसी संभावना की पुष्टि करने के लिए राजाजी टाइगर रिजर्व की विशेषज्ञ टीम 19 जून को हिमाचल प्रदेश पहुंची. वहां उन्होंने हिमाचल वन विभाग के अधिकारियों के साथ संयुक्त रूप से क्षेत्र का निरीक्षण किया और बाघ की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाने का प्रयास किया. इसके लिए संभावित क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप भी लगाए गए ताकि बाघ की तस्वीरें और उसकी आवाजाही के प्रमाण मिल सकें. हालांकि अब तक कैमरा ट्रैप में संबंधित बाघ दिखाई नहीं दिया है और न ही उसके दोबारा उत्तराखंड लौटने की कोई जानकारी सामने आई है.

पहले भी दूसरे राज्यों में जाते रहे हैं वन्य जीव: यह पहली घटना नहीं है जब राजाजी टाइगर रिजर्व का कोई बाघ अपनी पारंपरिक सीमा से बाहर निकलकर दूसरे राज्य तक पहुंचा हो. इससे पहले वर्ष 2023 में भी एक बाघ के हिमाचल प्रदेश पहुंचने की जानकारी सामने आई थी. उस समय भी वन विभाग ने उसकी निगरानी की थी, लेकिन बाद में उसके वापस राजाजी लौटने का कोई रिकॉर्ड सामने नहीं आया. इससे यह संकेत मिलता है कि कुछ बाघ नई टेरिटरी को अपनाने के बाद वहीं स्थायी रूप से बसने का फैसला कर रहे हैं.

केवल हिमाचल ही नहीं बल्कि राजाजी से बाहर निकलने वाले वन्यजीवों के उदाहरण उत्तराखंड के भीतर भी देखने को मिले हैं. कुछ समय पहले कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से लाए गए एक बाघ ने राजाजी के भीतर अपनी स्थायी टेरिटरी विकसित करने के बजाय देहरादून वन प्रभाग के ऋषिकेश क्षेत्र में अपना नया ठिकाना बना लिया था. यह घटना भी इस बात की ओर इशारा करती है कि वन्यजीव अपनी पसंद और परिस्थितियों के आधार पर नई जगहों का चयन कर रहे हैं.

राजाजी के हाथियों का झुंड हिमाचल और यूपी पहुंचा था: बाघों के अलावा हाथियों के मामले में भी ऐसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं. राजाजी से निकलकर हाथियों के कई झुंड हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक पहुंच चुके हैं. इनमें से कुछ झुंड लंबे समय तक वहीं रहे और कई हाथी वापस अपने पुराने क्षेत्र में नहीं लौटे. हाथियों का इस तरह लंबी दूरी तय करना सामान्य माना जाता है, लेकिन उनका स्थायी रूप से नई जगहों पर बस जाना वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय बन गया है.

राजाजी टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर का बयान: इन घटनाओं को लेकर राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक कोको रोसे का कहना है कि-

ऐसे कई मामले रिकॉर्ड में दर्ज हैं जिनमें वन्यजीव राजाजी की सीमा से बाहर गए हैं. वन्यजीवों का लंबी दूरी तक विचरण करना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति का हिस्सा है. विशेषकर युवा बाघ अक्सर अपनी नई टेरिटरी की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर तक का सफर तय कर लेते हैं. इसलिए किसी वन्यजीव का राजाजी से बाहर निकलना असामान्य घटना नहीं कही जा सकती है.
-कोको रोसे, निदेशक, राजाजी टाइगर रिजर्व-

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के कॉरिडोर ने दी घूमने की आजादी: हालांकि कोको रोसे यह भी स्वीकार करते हैं कि किसी एक विशेष कारण को वन्यजीवों के बाहर जाने की वजह बताना आसान नहीं है. इसके पीछे कई कारक एक साथ काम कर सकते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव दिल्ली-देहरादून हाईवे परियोजना के दौरान बनाए गए वन्यजीव कॉरिडोर और एलिवेटेड संरचनाओं को माना जा रहा है.

पहले राष्ट्रीय राजमार्ग और भारी यातायात वन्यजीवों की आवाजाही में बड़ी बाधा साबित होते थे. सड़क पार करने के दौरान दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता था. लेकिन अब कॉरिडोर और अंडरपास बनने के बाद वन्यजीवों की आवाजाही पहले की तुलना में काफी आसान हो गई है. इसका परिणाम यह हुआ है कि अब बाघ, हाथी और अन्य वन्यजीव बिना किसी बड़ी बाधा के उत्तराखंड से हिमाचल प्रदेश और अन्य क्षेत्रों की ओर जा पा रहे हैं. यह बदलाव संरक्षण की दृष्टि से सकारात्मक भी है क्योंकि इससे वन्यजीवों के बीच आनुवंशिक विविधता बढ़ती है और वे नए क्षेत्रों में अपनी आबादी स्थापित कर सकते हैं.

इस कारण नई टेरिटरी खोजते हैं वन्य जीव: वन विभाग के अधिकारी एक और संभावना की ओर भी इशारा करते हैं. पश्चिमी राजाजी क्षेत्र में तेंदुओं की संख्या काफी अधिक मानी जाती है. ऐसे में शिकार के संसाधनों और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण कुछ वन्यजीव नए और कम प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों की तलाश में बाहर निकल सकते हैं. विशेष रूप से युवा नर बाघ अक्सर बड़े और स्थापित बाघों के दबाव के कारण नई टेरिटरी की खोज में निकल पड़ते हैं.

राजाजी टाइगर रिजर्व के वेटरनरी अधिकारी डॉ विवेकानंद सती बताते हैं कि-

किसी भी वन्यजीव के लिए नई टेरिटरी चुनना एक जटिल और सोच-समझकर किया गया प्राकृतिक निर्णय होता है. वन्यजीव किसी क्षेत्र को चुनने से पहले वहां उपलब्ध संसाधनों और परिस्थितियों का आकलन करते हैं.
-डॉ विवेकानंद सती, पशु चिकित्सक, राजाजी टाइगर रिजर्व-

उनके अनुसार सबसे पहले वन्यजीव उस क्षेत्र में पर्याप्त वन क्षेत्र और प्राकृतिक आवास की उपलब्धता को देखते हैं. इसके साथ ही पानी की उपलब्धता भी उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. यदि किसी क्षेत्र में सालभर जल स्रोत मौजूद रहते हैं, तो वह वन्यजीवों के लिए अधिक आकर्षक बन जाता है.

वन्य जीवों के लिए सुरक्षा बड़ा कारक: सुरक्षा भी वन्यजीवों के लिए एक बड़ा कारक होती है. यदि किसी क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप कम हो और शिकार या अवैध गतिविधियों का खतरा कम हो, तो वन्यजीव वहां बसना पसंद करते हैं. शिकारी जीवों जैसे बाघ और तेंदुओं के लिए उनके पसंदीदा शिकार प्रजातियों की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है. यदि किसी क्षेत्र में चीतल, सांभर, जंगली सूअर और अन्य शिकार प्रजातियां पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं, तो वह क्षेत्र बाघों के लिए उपयुक्त माना जाता है.

हाथियों के लिए भोजन की उपलब्धता रखती है मायने: इसी प्रकार हाथियों के लिए भोजन की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है. हाथियों को प्रतिदिन बड़ी मात्रा में भोजन की आवश्यकता होती है. इसलिए वे ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हैं जहां घास, झाड़ियां, पेड़-पौधे और जल स्रोत प्रचुर मात्रा में मौजूद हों. इन तमाम तथ्यों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर राजाजी टाइगर रिजर्व के वन्यजीव लगातार बाहर क्यों जा रहे हैं. क्या यह केवल उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति का हिस्सा है या फिर इसके पीछे बदलती पारिस्थितिक परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं? क्या पड़ोसी राज्यों, विशेषकर हिमाचल प्रदेश के जंगल, वन्यजीवों के लिए बेहतर और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करा रहे हैं? या फिर बेहतर आवास, पर्याप्त भोजन और कम प्रतिस्पर्धा उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर रही है?

किसी के पास नहीं है स्पष्ट जवाब: फिलहाल इन सवालों के स्पष्ट जवाब वन विभाग और वन्यजीव वैज्ञानिकों के पास भी नहीं हैं. लेकिन इतना जरूर है कि राजाजी से हिमाचल और अन्य क्षेत्रों की ओर वन्यजीवों की बढ़ती आवाजाही आने वाले समय में शोध और अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बनने जा रही है. यह केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत के वन्यजीव प्रबंधन और संरक्षण रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत साबित हो सकता है.